एक अंजान सी जिंदगी..
कोक से बाहर जब वह चल पडा़,
लहू लुहान सा था वह बेचारा..
बदकीसमत था या कीसमतवाला पता नहीं,
देगा कोयी साथ या रह जायेगा बेसहारा..
पता नहीं किस कीस्म की भागदौड थी यहाँ,
लाल वह हुआ था पर चमक कोयी और रहा..
मुस्कुरा सब रहे थे जब वह रोता गया,
किस अंजान बस्ती में हूँ यह वह सोचता रहा..
नाम क्या दिया दुनिया ने यह भी पता न था,
बात तो न कर सकता बस रोना एक ही आता रहा..
कौन क्या पुकार रहा उसे भी समझ न था,
बस अंजाने थे आसपास यही उसे पता रहा..
रेंगते, गिरते, फिसलते, चलते, सीखते सीखाते,
बचपन से लेकर बालीग होने तक बहुत आजमा लिया..
कभी ना सोचा क्या है जिंदगी जिते जागते,
भटका और भूल गया, अपने बेवकूफी को साबीत किया..
उम्र बितती गयी पर हुआ न वह समझदार,
होता रहा वह हर कदम पे लापरवाह..
ना सोचा कभी क्या है जीवन में उसका कीरदार,
हद बेहद हो चला, रहता गया वह बेपरवाह..
बेचैनी बढती गयी अब सोच रहा वह नासमझ,
वक्त और गुजरा, धीमी हुई दिल की रफ्ताार..
यूं ही गवां दी जिंदगी मैंने आसान और सहज,
गलत कर बैठा मैं जो न किया जीवन साकार..
गिनता गया अपनी सांसे आखरी,
मान लिया उसने कि अब कुछ रहा नहीं..
बस आँखों में रोशनी और सांस में सिसकी खरी,
चल दिया वह अंजान सफर पर और दूर कहीं..
पता नहीं बदन ने मिट्टी चखी या आग को छुआ,
यह वही जानता है उसके बाद उसे क्या हुआ..
नर्क, स्वर्ग, जहन्नुम या जन्नत,
कौन कहाँ पहुंचा यह नहीं किसीको पता,
जिते समय नहीं दिखायी जब इनसानियत,
मिली की नहीं उसे वह, तो क्यों अपने तू मन को सता..
Monday, September 5, 2022
एक अंजान सी जिंदगी..
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